जब मैं अपने मित्र के साथ मुखर्जी नगर में रहा करता था, तब हमने गर्मियों में सेंट्रल रिफरेंस लाइब्रेरी मैं बैठकर पढ़ने का मन बनाया। विधिवत रूप से हमने वहां जाना शुरू किया पूरा रास्ता ढाई से 3 किलोमीटर का हुआ करता था, जिसे जाते समय हम लोग बैटरी रिक्शा से तय किया करते थे एवं आते समय रात के वक्त पैदल आया करते थे। एक दिन, किसी कारणवश, मेरे मित्र, 'दीपू' जो हमेशा साथ हुआ करते थे, वह साथ नहीं थे एवं मुझे अकेले वहां से अपने कमरे तक का सफर तय करना पड़ा। मेरे व्यक्तित्व की यह त्रुटि है कि जब मैं अकेला होता हूं तो बहुत विरक्त एवं नीरस भाव से चीजों को देखने का प्रयास करता हूं। गंभीरता की इस दशा में मैंने सहसा मार्ग का नाम पढा जो श्री राम कॉलेज व तिमारपुर पुलिस थाने के मध्य था। यह नाम उन नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों का नहीं था जिन्हें मैं जानता था, इससे जिज्ञासा भाव मेरे मन में उत्पन्न हुआ। "श्रेया मिश्रा मार्ग" मैं इस नाम को भी यूं ही पढे किसी नाम की तरह भुला देता लेकिन जिज्ञासा गहरी करने वाला एक और कारण भी था, हमारे कॉलेज की मित्र मंडली में इस नाम "श्रेया" का विशेष ...