विधिवत रूप से हमने वहां जाना शुरू किया पूरा रास्ता ढाई से 3 किलोमीटर का हुआ करता था, जिसे जाते समय हम लोग बैटरी रिक्शा से तय किया करते थे एवं आते समय रात के वक्त पैदल आया करते थे।
एक दिन, किसी कारणवश, मेरे मित्र, 'दीपू' जो हमेशा साथ हुआ करते थे, वह साथ नहीं थे एवं मुझे अकेले वहां से अपने कमरे तक का सफर तय करना पड़ा।
मेरे व्यक्तित्व की यह त्रुटि है कि जब मैं अकेला होता हूं तो बहुत विरक्त एवं नीरस भाव से चीजों को देखने का प्रयास करता हूं।
गंभीरता की इस दशा में मैंने सहसा मार्ग का नाम पढा जो श्री राम कॉलेज व तिमारपुर पुलिस थाने के मध्य था।
यह नाम उन नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों का नहीं था जिन्हें मैं जानता था, इससे जिज्ञासा भाव मेरे मन में उत्पन्न हुआ।
"श्रेया मिश्रा मार्ग"
मैं इस नाम को भी यूं ही पढे किसी नाम की तरह भुला देता लेकिन जिज्ञासा गहरी करने वाला एक और कारण भी था, हमारे कॉलेज की मित्र मंडली में इस नाम "श्रेया" का विशेष महत्व था।
जिज्ञासा वश फोन निकाला और जब पता करने की कोशिश की कि यह श्रेया मिश्रा कौन थी एवं जब पता चला तो दिल धक से बैठ गया।
श्रेया मिश्रा 22-23 वर्ष की लड़की थी। जो दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज में m.a. इतिहास की विद्यार्थी थी एवं फोटो कॉपी करवा कर रोड पार करते समय ट्रक द्वारा कुचल दिया जाने के कारण उनकी दर्दनाक मृत्यु हो गई थी ।
मृत्यु पश्चात विद्यार्थियों द्वारा किए गए एक छोटे से आंदोलन के बाद उस रोड का नाम परिवर्तित करके श्रेया मिश्रा के नाम पर रख दिया गया था।
हम जीवन में कितनी लंबी लंबी आकांक्षाएं पाल लेते हैं, आज यह करूंगा, दो साल बाद यह होगा, पांच साल बाद यह होगा फिर बीस साल बाद वह होगा और जीवन का तो कोई भरोसा ही नहीं है।
सांस की डोर कभी भी टूट सकती है दीर्घकालिक आकांक्षाओं के बाहुपाश मैं हम नीरस और तनावपूर्ण जीवन जीते हैं अपने आज को कठिन बनाते हैं, दुखी बनाते हैं ताकि भविष्य में आराम किया जा सके लेकिन कौन जानता है कि वह भविष्य है भी या नहीं।
क्या मालूम सारा जीवन इसी तनावपूर्ण स्थिति में चुक जाए।
जीवन के सारे आदर्श व मूल्य धराशाही हो गए चौपट हो गए व्यर्थ से मालूम पड़ने लगे।
निश्चय किया कि चाहे जीवन में कुछ भी हो जाए हमेशा प्रसन्न एवं तनाव मुक्त होकर जीने का प्रयास जरूर करूंगा।
शायद आप भी ऐसा ही करें।
आपके राम।
Nice bhai
ReplyDeleteBahut sunder vichar mitra... Aane wale kal ki soch ke hame apne 'AAJ' ko Bilkul niras nahi bnana chahiye
ReplyDeleteAn argumentative manifesto to embrace uncertainty.
ReplyDeleteWriter has very crafty exposed the frangible nature of life. In this anxiety riddled quarter life crisis, this piece provides a much needed escapism from our mundane day to day lives. The so called logic of orderly "pre-planned" career goals do not hold water for many, and this anti-existentialism thought has been very beautifully captured here in this post.
Dear writer, we wish to read you more. Not because of your command on the language (which we secretly envy), but because of your humility and modesty which is exhibited in your writings.
Please guard these qualities of yours.
In hope that your feelings increasingly find a way to this blog,
Yours
N